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असिस्टेंट कमिश्नर राजनाथ तिवारी जी की यह रचना जरूर पढिऐ।

 एक सकारात्मक ऊर्जा मिलेगी।


लेकिन पढ़ तू।


मित्र नहीं,एकाकी रह तू।

महल नहीं है,कुटी में रह तू।

शाल नहीं है,जाड़ा सह तू।

फटे पुराने वस्त्र पहन तू।

अन्न नहीं है,भूखा रह तू।

एक वक्त ही भोजन कर तू।

अर्थ नहीं है,तो श्रम कर तू।

शक्ति हीन है,गाली सह तू।

खुले गगन के नीचे रह तू।

कार नहीं है,पैदल चल तू।

लेकिन पढ़ तू,लेकिन पढ़ तू।


बार बार की असफलता में,

हारे मन की व्याकुलता में,

स्वजन वृन्द की कर्कशता में,

भाव हृदय की कोमलता में,

बार बार गृह परिवर्तन में,

उपहासों के तीव्र तपन में,

अवरोधों के परिवर्धन में,

आधि व्याधि के आवर्तन में,

जीवन सरि के कल कछार में,

व्यथा-नीर-असिवन्त धार में,

स्वयं को गढ़ तू,स्वयं को गढ़ तू।


छाई हों घनघोर घटाएं,

चहुँ दिशि आती क्रूर हवाएँ,

कहर ढा रही हों विपदाएँ,

यामिनि रौद्र रूप दिखलाये,

पंथ लीलता अन्धकार हो,

सौ सौ रिपुवों का प्रहार हो,

नाव उलझती बीच धार हो,

पीणा तन के आर पार हो,

कोई तेरे साथ न आये,

तू प्रभात को खोज न पाये,

फिर भी चल तू,फिर भी चल तू।

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